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ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना…




“माँसाहार गरीबों के लिए वरदान है क्योंकि माँसाहार के माध्यम से गरीबों को सस्ता प्रोटीन मिल जाता है।“ १ ग्राम प्रोटीन अगर आप मटन से लेते हैं तो लगते हैं ३ रुपये। उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप अंडे से लेते हैं तो लगते हैं १ रुपय ३० पैसे, उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप चिकन से लेते हैं तो लगता हैं १ रुपया।

प्रश्नकर्ता: पिछली बार चंडीगढ़ तरफ़ से आया था जी,। आप से जुड़ा था। तबजब मैं अकेला आया था, बिलकुल हताश, परेशान था। आज मेरीमेरे साथ श्रीमती जी भी आईं हैं। मेरा प्रश्न यह है जी, जैसे संतों ने कहा है—
प्रेम-गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं। जब मैं था…

पारस में अरु संत में, बड़ो अन्तरो जान। वो लोहा कंचन करे, ये कर दे आप समान।।~कबीर साहब प्रश्नकर्ता: जैसा कि आप कहते हैं, कि जितना जल्दी हो सके अपने को पूरा अर्पण कर दो, या ख़त्म कर दो, पर यदि इसे समझेंगे और करेंगे, तो अपने अपूर्ण स्थिति…

आचार्य प्रशांत: पूछा है कि, "कबीर साहब कह गए हैं कि;
कोटि नाम संसार में, तासे मुक्ति ना होए। आदि नाम जो गुप्त है, बूझे बिरला कोए।। ~कबीर साहब
तो इसमें किस नाम की बात हो रही है? फिर आगे कहते हैं कि ऐसे ही तुलसीदास कह गए हैं कि…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी को प्रणाम। आचार्य जी, कबीर दास जी कहते हैं , "लूट सको तो लूट लो, राम नाम की लूट। पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाएँ जब छूट।" तो राम नाम की लूट से क्या आशय है? कृपया प्रकाश डालें और प्रणाम स्वीकार करें।
आचार्य प्रशांत: कपिल (प्रश्नकर्ता), जीवन…

प्रश्नकर्ता: मेरे काम में दान-दक्षिणा दोनों प्राप्त होते हैं, और मेरी जानकारी में 'दान' अलग विषय है और 'दक्षिणा' अलग विषय है। दक्षिणा मतलब हुआ कि आपने जो सेवा कर्म किया, और दान जो आपको मिलता है। दान की महिमा तो बहुत सुनी है परंतु दान के विषय में कुछ…

आचार्य प्रशांत: इतना तो हम सभी जानते हैं कि राम के स्पर्श ने रामबोला को तुलसीराम और तुलसीराम को तुलसीदास बना दिया। लेकिन याद रखना होगा कि जैसा भक्त होता है, वैसा ही उसका भगवान भी होता है। भगवान तो भक्त को रचता ही है, भक्त के हाथों भी भगवान…

नामु राम को कलपतरु, कलि कल्यान निवासु।
जो सिमरत भयो भाँग ते तुलसी तुलसीदास।।
~ संत तुलसीदास

तुलसी राम कृपालु सों, कहिं सुनाऊँ गुण दोष।
होय दूबरी दीनता, परम पीन संतोष।।
~ संत तुलसीदास

तुलसी ममता राम सों सकता सब संसार।
राग न द्वेष न दोष दु:ख दास भए भव पार।।
~ संत तुलसीदास

बस्स कर जी हुण बस्स कर जी
काई गल असां नाल हस्स कर जी।
तुसीं दिल मेरे विच वस्सदे सी, तद सानु दूर क्यों दसदे सी,
घत्त जादू दिल नु खस्सदे सी, हुण आइयो मेरे वस कर जी।

प्रश्नकर्ता: सर, कोई आदमी कब सुसाइड (आत्महत्या) करने के बारे में सोचने लगता है? हम लोगों के दिमाग में तो आता भी नहीं है यह ख़याल।
आचार्य प्रशांत: यह किसके दिमाग में आया अभी-अभी?
प्र: कुछ लोग मर जाते हैं

खसम उलटि बेटा भया, माता मिहरी होय।
मूरख मन समुझै नहीं, बड़ा अचम्भा होय।।
~ कबीर साहब

कहता हूँ कहि जात हूँ, कहा जु मान हमार।
गल तुम काटि हो, सो फिर काटि तुम्हार।।
~ संत कबीर

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर। ।
~गुरु कबीर
प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम। कृपया गुरु कबीर की इन पंक्तियों का आशय स्पष्ट करें।

प्रश्न: आचार्य जी, नमन।
कबीर दास जी का एक दोहा है –
सभी कर्म हमारो किया, हम कर्मण ते न्यारे हो

प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम। विचारों का प्रवाह पहले से अधिक अनुभव होता है। कहाँ-कहाँ की सारहीन बातें मन को घेरे हैं। मन को निरंतर चलता देखकर खीज-सी उठती है, कि ये विचार क्यों और कहाँ से आ रहे हैं। पहले इतना शोर अनुभव नहीं होता था। अब मन यह देखकर…

प्रश्न:
कबिरा यह मन लालची, समझे नहीं गंवार।भजन करन को आलसी, खाने को तैयार।।
~ गुरु कबीर

चकमक पत्थर रहे एक संगा, नहीं उठे चिंगारी।
बिनु दया संयोग गुरु बिनु, होत नहीं उजियारी।।
~ संत कबीर साहिब

लकड़ी जल डूबे नहीं, कहो कहाँ की प्रीति।
अपनी सीची जानि के, यहीं बड़ने की रीति।।
~ गुरु कबीर

*साधो भाई जीवत ही करो आसा।***
*जीवत समझे, जीवत बुझे,* *जीवत मुक्तिनिवासा।*
*जीवत करम की फाँस न कटी,* *मुये मुक्ति की आसा।*

गगन दमदमा बाजिया, पड़ेया निसानी घाव।खेत बुहारया सूरमा, मुझे मरण का चाव।।
~ कबीर
आचार्य प्रशांत: जब कबीर गगन की, आकाश की बात करते हैं, तो उनका आश्य होता है मन का आकाश, चिदाकाश। वो बात कर रहें हैं कि जो आपका आतंरिक आकाश है, वहाँ पर ध्वनि हो

जो तू चाहे मुक्त को, छोड़ दे सब आस|
मुक्त जैसा ही हो रहे, सब कुछ तेरे पास||
~ कबीर

श्रोत १: आचार्य जी, एक प्रश्न इसके अनुवाद में था, लिखा था, कोई उसकी शक्ति का गुणगान करे, ये शक्ति किसके पास है?
आचार्य जी: नहीं, वो ठीक है। वो अनुवाद में गलती नहीं है। नानक कह रहें हैं कि जिसको मिलता है, वो गाता है। वो सबको दे रहा…

सुख सागर का शील है, कोई न पावै थाह।
सुख सागर का शील है, कोई न पावै थाह।
शब्द बिना साधू नहीं, द्रव्य बिना नहीं शाह।।

निन्दक तो है नाक बिन, सोहै नकटी माहि। साधुजन गुरुभक्त जो, तिनमे सोहै नाही॥
निन्दक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥
~ गुरु कबीर

*“अब* तो जाग मुसाफिर *प्यारे,* रैन गयी लटके सब *तारे*
*आवागौण* सरायी *डेरे,* साथ तैयार मुसाफिर *तेरे***
*अजे* ना सुनियो कूच *नगारे*

प्रश्न: आचार्य जी, बाबा शेख फ़रीद, ऐसा क्यों बोल रहे हैं, कि “जो तुमसे भय मानता हो, तुम उससे भय मानो?”
आचार्य प्रशांत: तो, कहा है कि जो तुमसे भय मानता हो, तुम उससे भय मानो।बताते हैं कि बाबा फ़रीद के उपदेशों में से समझेंगे। आप यदि किसी…

आचार्य प्रशांत: पूरी प्रकृति में आदमी अकेला है जो भटक गया है। और सब जितने भी हैं, वो अपने घर में हैं। वो वहीं हैं, जहाँ उन्हें होना था। वो अपने घर से कभी बाहर निकले ही नहीं।
चारों और देखोगे तो पाओगे कि हर तरफ एक निर्विकल्पता है।…

मैनूं लगड़ा इश्क़ अवलड़ा अव्वल दा, रोज़ अज़ल दा।
विच कड़ाही तिल-तिल पावे, तलिआं नूं चा तलदा।
मोइआं नूं एह वल-वल मारे, दलियां नूं एह दलदा।

अब लगन लगी की करिये
अब लगन लगी किह करिए? ना जी सकीए ते ना मरीए।
तुम सुनो हमारी बैना, मोहे रात दिने नहीं चैना, हुन पी बिन पलक ना सरीए। अब लगन लगी किह करीए?

चुप्प कर के करीं गुज़ारे नूं
सच्च सुणदे लोक ना सहिंदे नी, सच्च आखिए तां गल पैंदे नी, फिर सच्चे पास ना बहिंदे नी, सच्च मिट्ठा आशक प्यारे नूं । चुप्प करके करीं गुज़ारे नूं ।

जाके जौन स्वाभाव, छूटे नहीं जीव सो,
नीम ना मीठी होय, सींचै गुड़ घीव सो।।
संत कबीर

उमरिया धोखे में खोये दियो रे पाँच बरस का भोला भला, बीस में जवान भयो। तीस बरस में माया के कारण, देश-विदेश गयो। उमर सब धोखे में… चालीस बरस अंत अब लागै, बाढ़ै मोह गयो। धन धाम पत्र के कारण, निस दिन सोच भयो।। बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत…

हाथ सुमरनी पेट कतरनी, पढ़त भागवत गीता ।
राम भजा सो जीता जग में, राम भजा सो जीता ।।
संत कबीर

कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिए कोय|
आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय||
~संत कबीर

दुःख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै, तो दुःख काहे को होय।।
संत कबीर

आशा तो गुरुदेव की, दूजी आस निरास।
पानी में घर मीन का, क्यों मरे पियास।।
कबीर

कबीरा जब पैदा हुए तो जग हँसा हम रोये
ऐसी करनी कर चलो कि हम हँसे जग रोये
सात जन्म के सात फेर हैं

सन्त पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह|
लखा जो चाहे अलख को, उन्हीं में लख लेह||

मन माणिक मूरख राखि रे, जण-जण हाथ न देऊ।दादू पारिख जौहरी, राम साधु दोइ लेऊ।।71।।
~दादू दयाल

वक्ता: दो बातें हैं। पहली, योग है। दूसरी, अनंत समय है।
“युगन युगन हम योगी।” और ये दोनों ही बातें जब एक साथ कह दी जाती हैं, तो पूर्ण कह दिया जाता है। योग का अर्थ है: केंद्र। ‘अनंत समय’ का अर्थ है: उस केंद्र से फैला हुआ पूरा विस्तार।…

जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ। मैं बपुरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ।।
~ संत कबीर
प्रश्नकर्ता: इस दोहे को जब मैं अपने जीवन के सन्दर्भ में देखती हूँ तो पाती हूँ कि मेरे सारे प्रयत्न, जवाबों को ढूँढने की राह में कम ही पड़ते हैंI अपने प्रयासों को
The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.
संसार में कुछ ऐसा नहीं जो कुछ दे सकता है, और कुछ ऐसा नहीं जो कुछ ले सकता है, तो यहाँ तो…
तुसीं मोयां नूं मार ना मुक्कदे सी, नित्त खिद्दो वांङ कुट्टदे सी,…
आचार्य: बेटा, हर आदमी लगातार दुःख से…
खसम उलटि बेटा भया
'खसम' का अर्थ हुआ जिसको तुमने स्वामी का स्थान दिया, और 'बेटा' हुआ स्वामी को स्वामित्व देने का…
आचार्य प्रशांत जी:
एक ही है जो बड़ा है, जो वृहद है, उसे ‘ब्रह्म’ कहते हैं। उसके…
आचार्य प्रशांत जी: ये कबीरों की, संतों की अपनी आंतरिक स्थिति है, अपनी कहावत है। कह रहे हैं, “ऊपर-ऊपर से प्रतीत होता है कि…
श्रोता: आग जलाने के काम आता है।
आचार्य प्रशांत: ठीक है!
चकमक पत्थर रहे एक संगा।
अकेला है वो। वो कह…
*अबहूँ मिला तो…
आचार्य जी: दो तरफा प्रयोजन है यहाँ पर कबीर का, शब्द से। एक तो गहरी परीक्षा साधू…
आचार्य प्रशांत: निंदक तो है नाक बिन। नाक से अर्थ है—मान, कीमत। उसकी अपनी कोई कीमत नहीं होती है। उसकी…
*कर* लै अज करनी दा *बेरा,* मुड़ ना होसी आवन *तेरा***
*साथी* चल्लो *पुकारे*
*मोती…
बुल्ल्हा, शौह दा न्योंह अनोखा, ओह नहीं रलाइआं रलदा।
~ बुल्ले शाह
प्रश्नकर्ता: मुझे…
आचार्य प्रशांत: यहाँ पर कबीर जिस स्वभाव की बात कर रहे हैं,…
श्रोता१: भजा तभी जा सकता है जब उस चीज़ को समझ सको।
श्रोता२: भजा मतलब एक पूरी मौजूदगी इन्वॉलव्ड है।…
माया तो ठगनी भयी, ठगत फिरत सब देश|
जा ठग ने ठगनी ठगी, ता ठग को आदेश||
मुक्ति सर्व आयामी और…
जम का दंड मुंड पे लागे
धरी रहे चतुराई
कबीरा जब पैदा हुए तो जग हँसा हम रोये
ऐसी करनी कर चलो…
वक्ता: संत कौन है? संत पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह, लखा जो चाहे अलख को, उन्हीं में लख जे लेह| संत कौन है? संत वो है जिसने अपनी हर…