
सेक्स अगर तुम्हें शांत कर सकता होता, दो बार, चार बार में कर गया होता न? यहाँ तो लोग अपने जीवन काल में हज़ारों बार कर जाते हैं और उसके बाद भी लालायित रहते हैं, प्यास ही नहीं बुझती।
अधेड़ हो गए, साठ के हो गए, अस्सी के हो गए,…

डिप्रेशन तब तक नहीं हो सकता जब तक अपने-आप को बहुत मजबूर अनुभव ना करो । और मजबूर हम नहीं होते, मजबूर हमें हमारी अंधी कामनाएँ बनाती हैं। अन्यथा कोई मजबूर नहीं है। कामनाओं में भी कोई दिक़्क़त नहीं है, अगर वो अंधी ना हों। कुछ ऐसा माँग रहे हो…

तुम्हें क्या लगता है नर्क वो जगह है जहाँ बड़े-बड़े कड़ाहों में तेल उबल रहा है और लोग उसमें पकौड़ो की तरह तले जा रहे हैं? ना! नर्क वो जगह है जहाँ सब खूब मेहनत करते हैं, कमाते हैं, खाते हैं और सो जाते हैं। नर्क बड़ी साफ़-सुथरी जगह है…

प्रश्नकर्ता: हमारे मन का स्तर उठता क्यों नहीं? हम बेहतर होना चाहते हैं, पर चाहते हुए भी बेहतर हो क्यों नहीं पाते?
आचार्य प्रशांत: देखिए जो ये शब्द होता है न 'चाहना', ये थोड़ा भ्रामक शब्द है। हम साफ़-साफ़ जानते नहीं हैं कि हम चाहते क्या हैं। आप पूछेंगे तो…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, गहरे रिवेंजफुल यानि प्रतिहिंसा से भरे हुए विचारों से मुक्ति कैसे पाएँ? बहुत सारी ऐसी भावनाएँ हैं जो हम प्रकट नहीं कर सकते लेकिन वो बहुत पुरानी हैं, उनमें बड़ी जान है।
आचार्य प्रशांत: बदले की भावना। बार-बार याद आना कि अतीत में किसी ने हमारे साथ…

आचार्य प्रशांत: लोग पूछते हैं, “अध्यात्म की ज़रूरत क्या है?"
तुम अगर आध्यात्मिक नहीं हो तो ऐसा नहीं है कि तुम्हारे साथ कुछ अच्छा घटेगा, कुछ बुरा घटेगा। हमारे साथ जो तय है होना, जो डिफ़ॉल्ट (अकारण) है, वो प्राकृतिक है; और वो हमारे लिए अच्छा नहीं है। ये बात…

कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात्।
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गताः॥९- २॥
~ अष्टावक्र गीता
हे पुत्र! इस संसार की (व्यर्थ) चेष्टा को देखकर किसी धन्य पुरुष की ही जीने की इच्छा, भोगों के उपभोग की इच्छा और भोजन की इच्छा शांत हो पाती है।

प्रश्नकर्ता: समस्या ये है कि आत्मा भी चाहिए और अहंकार छूटता नहीं।
आचार्य प्रशांत: 'अहंकार' को आत्मा चाहिए समस्या ये है। 'अहंकार' कहता है मुझे चाहिए। उसकी नियत में ख़राबी नहीं है उसे चाहिए पर वो कहता है कि 'मुझे' चाहिए। वो ये नहीं कहता मैं उसको मिल जाऊँ, वो…

प्रश्नकर्ता: पिछले बाईस वर्षों से मैं एक साधना कर रहा था। अब ऐसा लगता है कि मैं ग़लत रास्ते पर साधना कर रहा था। तो इस संबंध में एक चौपाई आयी है कि शिव जी कहते हैं कि,
उमा कहूँ मैं अनुभव अपना।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, 2011 के आसपास मुझे डिप्रेशन की समस्या हुई थी। उस समय घर में अशांति की वजह से मानसिक संतुलन थोड़ा ख़राब हो गया। एकदम से 'डर' आ गया जीवन में, और उसके बाद से वैसे ही चल रहा है। डर एकदम से हावी होता ही रहा,…

प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम! अभी तक जितना जीवन जिया, सब भौतिक वस्तुएँ एकत्रित करने में बिता दिया। आपके वीडियोज़ सुनने शुरु किए आठ-नौ महीने से, तो झूठ दिखता है कि कितना बेहोशी वाला जीवन जिया है। फ़िर, कहीं-न-कहीं उनका आकर्षण बना रहता है। जब परिवार में अपने परिवारजनों को देखते…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या ज्ञान प्राप्ति के लिए कर्म अनिवार्य है? कर्म के अलावा ज्ञान प्राप्ति के कौन-कौन से साधन हैं? ज्ञान की प्राप्ति के मार्ग में बाधा क्या है?
आचार्य प्रशांत: ज्ञान की प्राप्ति का सबसे बड़ा साधन तुम्हारी मुमुक्षा है। साधन तुमने कहा न। स्वयं आदि शंकराचार्य ‘साधन…

प्रश्न: यदि ईश्वर सबकी सभी माँगें पूरी कर दें, तो क्या होगा?
आचार्य प्रशांत: तो ईश्वर का अस्तित्व मिट जाएगा।
ईश्वर और जीव एक ही द्वैत के दो सिरे हैं। ईश्वर जीव की कामना है; ऐसी कामना जिससे वो सोचता है कि अन्य कामनाओं की पूर्ति हो जाएगी।

प्रश्न: आचार्य जी, ‘अपराध बोध’ क्या है?
आचार्य प्रशांत: गहरा अहंकार। मैं, मुझ जैसा, ग़लती कैसे कर बैठा, यह ‘अपराध बोध’ है। इससे फिर निकलता है, पछतावा, ग्लानि, कुंठा। उसके मूल में यही है, मैं गलती कैसे कर बैठा और एक दूसरा मन होता है, जो कहता है, “हम जैसे…

प्रश्न: “मन जब भी कुछ छोड़ना चाहता है तो ऊपर-ऊपर की ही बात होती है, अंदर कहीं ना कहीं वो शायद पकड़ कर ही बैठा है। ऊपर-ऊपर से लगता है कि काफी कुछ जान गया, पर अंदर से पता है कि झूठ कितना है, स्थिति वही है। प्रश्न मैं ये…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने एक प्रवचन में कहा है कि, "जो माँगोगे वो मिलेगा। अगर नहीं मिलता तो ये समझना कि वो तुम्हारे लिए नहीं है।" तो हमें कैसे पता चलेगा कि हमे क्या माँगना चाहिए और क्या नहीं माँगना चाहिए, ताकि हमें वो मिले जो हम माँगें?
आचार्य प्रशांत:…

आचार्य प्रशांत: एक कहानी सुना रहा हूँ, ठीक है? इसको तार्किक तरीके से मत सुनना, इसका भाव समझने की कोशिश करना। कहते हैं, कि एक बार एक फ़कीर आया एक राजा के यहाँ पर। बड़ा राजा था, राजा से बोलता है एक छोटा सा कुछ चाहिये, मिलेगा? थोड़ा सा…

आचार्य प्रशांत: सब कुछ तो सिर्फ़ जानना है न? खुद जानना। बस सुन नहीं लेना। किसी ने बोल दिया कि इंजीनियरिंग कर लो, तो कर ली। अब किसी ने बोल दिया कि चलो सॉफ्टवेयर वाली जॉब ले लो, तो ले ली। फिर किसी ने बोल दिया कि अब ये है,…

अष्टावक्र गीता (अध्याय २ श्लोक १८)
न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्तो निराश्रया।
अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम्।।

वक्ता: आप जो कुछ भी पाना चाहते हो, वो पहले ही मौजूद है। अगर पहले से ही मौजूद ना हो तो वो इंस्टिंक्ट ही नहीं उठेगी पाने की।
श्रोता: हम ये कह सकते हैं कि जो लक्ष्य है मूलतया वो गन्दगी को साफ़ करने का है ताकि जो हम हैं,…

प्रश्न: सर, मेरा सवाल है- दो लोग एक ही समाज में पले-बड़े हैं, एक ही जैसी स्थिति में, लेकिन बहुत बार ऐसा देखते हैं कि दोनों के शौक बिलकुल अलग-अलग होते हैं, ऐसा क्यों होता है? एक अगर इस दिशा में जा रहा है, तो दूसरा दूसरे दिशा में, बिलकुल…

वक्ता: पिंजरा कितना भी मज़बूत हो, उसकी तीलियाँ कितनी भी सघन, लेकिन आकाश अपना अहसास करा ही देता है। बिलकुल बंद दीवारों द्वारों वाला पिंजरा हो, तो भी अपना अहसास करा देगा क्यूँकी आकाश पिंजरे के बाहर ही नहीं, पिंजरे के भीतर भी है, और पक्षी के भीतर भी है।…

श्रोता: सर ये, ‘द सुप्रीम इज़ द यूनिवर्सल साल्वेंट’?
वक्ता: ‘द सुप्रीम इज़ द यूनिवर्सल साल्वेंट’। बहुत बढ़िया; कुछ नहीं है जो उसमें गल नहीं जाता, कुछ नहीं है जो उसमें लय नहीं हो जाता। हम ये तो हर समय बोलते रहते हैं कि “द सुप्रीम इज़ द अल्टीमेट…

प्रश्न: उन पलों में जिनमें हम ध्यान में नहीं होते, उन पलों में एक गति होती है। वो गति ध्यान के पलों में क्यों नहीं होती?
वक्ता: गति की ज़रूरत सिर्फ़ तभी पड़ती है जब कोई संचलन या निरंतरता हो। ध्यान में सब आता और जाता है। ध्यान में कोई…

प्रश्नकर्ता: सर, मैंने आपके और भी कई संवाद सुने हैं, देखे हैं, उनमें एक कड़ी जुड़ती है निर्भरता और अहंकार में।
आचार्य प्रशांत: जब इतना सुने हो, तो जानते तो और ज़्यादा हो।
प्र:

आचार्य प्रशांत: बाहर जो कुछ भी है, वो तो एफ़र्ट (प्रयास) माँगेगा-ही-माँगेगा। ‘एफ़र्टलेसनेस ’ कहाँ होती है?
प्रश्नकर्ता: मन में।
आचार्य: वहाँ एफ़र्टलेसनेस रहे, वहाँ पर अनावश्यक संघर्ष ना रहे। मानसिक एफ़र्ट का मतलब होता है, बहुत सारी बातें जो सोच रहे हैं, बहुत सारे विकल्प हैं जो सामने

कबीर माया पापिनी, लोभ भुलाया लोग। पूरी किनहुं न भोगिया, इसका यही बिजोग।।
~ संत कबीर
वक्ता: क्या समझ आया इस दोहे से?

प्रश्नकर्ता: सर, ये जो तीन गुणों का मॉडल है प्रकृति में — तमस, रजस और सत्, तो इसमें एक *हाइरार्की * (अनुक्रम) भी है। तमस, फिर रजस, फिर सत। तो सर, सत् में ऐसा क्या होता है कि वो ज़्यादा करीब होता है साक्षित्व के?
आचार्य प्रशांत: साक्षी हल्का…

श्रोता: सर, एक तरफ़ तो हमारी सारी ज़रूरतें पूरी नहीं हो पाती हैं| और दूसरी तरफ़ दुनिया में हर वक़्त हमें आँका जा रहा होता है| ऐसे में हम परिस्तिथियों के ग़ुलाम बन कर रह जाते हैं| इस दशा को सुधारने के लिये क्या करें?
वक्ता: बेटा ज़रूरतें हमारी बहुत…

आगि जो लागि समुद्र में, धुआँ न परगट होय ।
की जाने जो जरि मुआ, जाकी लाई होय ।।
~कबीर

श्रोता: सर, इच्छाओं को नियंत्रित कैसे करूँ?
वक्ता: कृष्णमोहन पूछ रहे हैं कि इच्छाओं को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है। अच्छा! क्यों नियंत्रित करना है? सवाल यह तुम सब का है। यहाँ पर कोई ऐसा नहीं है जिसके सामने यह सवाल इस रूप में नहीं तो किसी और रूप…



Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…


पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक तरफ़़ तो फ़िल्में हमें मनोरंजन देती हैं, हँसाती हैं, रुलाती हैं और दूसरी ओर उसी इंडस्ट्री से दुःखद और चौका देने वाली खबरें भी आती रहती हैं। कुछ कहिए।








यदा नाहं तदा मोक्षो
यदाहं बन्धनं तदा।
मत्वेति हेलया किंचिन्-
मा गृहाण विमुंच मा॥८- ४॥



प्रश्नकर्ता: अभी आप कह रहे थे कि श्रीकृष्ण अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं और बाकी सब लोग अपने बारे में बोले जा रहे हैं। तो क्या इसका सम्बन्ध इससे है कि श्रीकृष्ण का कर्मफल और प्रारब्ध कट चुका है लेकिन बाकी सभी का कर्मफल और प्रारब्ध अभी जारी

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
"कुल के नाश से, चले आ रहे कुल के धर्म नष्ट हो जाते हैं और कुलधर्म के नष्ट होने से पाप समस्त कुल को दबा लेता है।"

आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण की निकटता सीखनी है अर्जुन से; अर्जुन के भीतर का कोहरा उधार नहीं ले लेना है। और हमारी हालत ज़बरदस्त है, हमारे पास वो सब कुछ है जो अर्जुन के पास है, बस एक चीज़ नहीं है। हम हर मायने में अर्जुन हैं, अर्जुन का पूरा नर्क
आचार्य प्रशांत: इच्छा को शांत करना कोई…
आचार्य…
जीव…
This article is related to restlessness.
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो हमें इस धारणा से बाहर आना होगा कि फ़िल्में हमें मात्र मनोरंजन…
प्रश्नकर्ता: कृष्ण अध्याय नौ में बताते हैं कि वे सब भूतों में समभाव से व्यक्त हैं, वहीं अध्याय दस में बताते हैं कि जो कुछ भी विभूतियुक्त, कांतियुक्त और शक्ति युक्त है, वो कृष्ण की अभिव्यक्ति है। अध्याय नौ में कृष्ण कहते हैं कि ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद मैं ही हूँ…
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:।।
जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वह आत्मसंयमी के जागने का समय है और जो समस्त जीवों के जागने का समय है, वह आत्मनिरीक्षक मुनि के लिए रात्रि है।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६९
प्रश्नकर्ता: जब…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। आज का सबसे पहला प्रश्न जो है वह सनातन के ऊपर है कि सनातन माने क्या? और ऐसा क्या है जिसको वास्तविक रूप में सनातन कहा जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, सनातन का अर्थ होता है वो जो काल की सीमाओं से के बाहर का हो।…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अर्जुन कहते हैं कृष्ण से कि ‘धृतराष्ट्र पुत्र चाहे मुझे मार भी दें तो भी उनसे लड़ना तो ग़लत ही है।‘ हमारे आम जीवन में भी ऐसे ही चलता रहता है कि हम इमोशनल ब्लैकमेल (भावनाओं से किसी को नियंत्रित करना) करते हैं बहुत बार, या…
प्रश्नकर्ता: कुछ दिन पहले आपने एक उदाहरण दिया था, एम एच ३७० का, कि हम जो खोज रहे हैं वो हमें कहीं मिल नहीं रहा इसलिए यूनिवर्स (ब्रह्माण्ड) इतना बड़ा है कि लगातार हम खोजते जा रहे हैं। तो स्पेस (स्थान) की तो बात उससे समझ में आ रही है।…
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४०
आचार्य प्रशांत तो अर्जुन के…