
जहाँ माँस खाना शुरू किया, तहाँ समझ लो कि आप कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ाने वालों की कतार में शामिल हो गए। उपभोग के माध्यमों में जो चीज़ ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक उष्मीकरण) के लिए सबसे ज़्यादा घातक है वो है माँस का सेवन। माँस का सेवन समझ रहे हैं सबसे ज़्यादा घातक…


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ये तो साफ है कि जो वैश्विक समस्याऍं हैं, बड़ी समस्याऍं, जैसे ग्लोबल वॉर्मिंग (भूमंडलीय ऊष्मीकरण) या क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन), उनका कारण ये गलत खोज ही है, कि इंसान गलत जगह पर खोज रहा है। तो एक आइडियल वर्ल्ड (आदर्श विश्व) तो यही होगा कि ये…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी।
सरकार और जितने भी चिकित्सा प्रमुख हैं, जानकार हैं, उन्होंने एक बात साफ-साफ कह दी है कि इस बीमारी का निवारण बहुत साफ है—'सोशल डिस्टन्सिंग'। जबतक एंटीडोट नहीं आ जाता और उसको न जाने कितने साल लगेंगे, तब तक आप एक दूसरे से दूर रहें और…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पर्यावरण को लेकर के बचपन से ही रुझान रहा है और जैसे-जैसे बड़े हुए हैं, उसको विनाश की ओर बढ़ते हुए ही देखा है। काफ़ी इच्छा थी कि इसके लिए कुछ किया जाए पर फिर अपने काम-धाम में ही लग गए। जब कभी भी गाड़ियों में से…

प्रश्न: आचार्य जी, 'भोजन' और 'अध्यात्म' बहुत बातें होती है इस पर — यह मत खाओ, वह मत खाओ, शरीर शुद्धि इत्यादि। कृपया प्रकाश डालें इस विषय पर।
आचार्य प्रशांत: "जल्दी से खाओ और आगे बढ़ो, बहुत काम करना है" — मेरे देखे तो अध्यात्म और भोजन का यही संबंध…

प्रश्न: आचार्य जी, वर्तमान जीवन के व्यवहारिक कष्टों पर प्रकाश डालने की अनुकम्पा करें।
आचार्य प्रशांत: दो-तीन बातें हैं, और बड़ी सीधी-सीधी हैं।
पहली बात तो ये कि - बच्चे मत पैदा करो। अगर ये उम्मीद कर रहे हो कि दुनिया में आठ-सौ करोड़ लोग हैं आज - जो कि

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ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना…




प्रश्नकर्ता: पिछली बार चंडीगढ़ तरफ़ से आया था जी,। आप से जुड़ा था। तबजब मैं अकेला आया था, बिलकुल हताश, परेशान था। आज मेरीमेरे साथ श्रीमती जी भी आईं हैं। मेरा प्रश्न यह है जी, जैसे संतों ने कहा है—
प्रेम-गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं। जब मैं था…

एक बार आप कहीं के लोगों की आदत डलवा दें, कि तुम्हें माँस-ही-माँस खाना है, बिलकुल सब और तला-भुना भी खाना है। अब क्षेत्र में अगर कोई आकर के सेहतमंद खाना बेचना भी चाहे तो उसका रेस्तराँ बंद हो जाएगा कि नहीं हो जाएगा?
तो यह लोग जो गंदगी फैला…

“माँसाहार गरीबों के लिए वरदान है क्योंकि माँसाहार के माध्यम से गरीबों को सस्ता प्रोटीन मिल जाता है।“ १ ग्राम प्रोटीन अगर आप मटन से लेते हैं तो लगते हैं ३ रुपये। उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप अंडे से लेते हैं तो लगते हैं १ रुपय ३० पैसे,…

आज से १ लाख वर्ष पीछे जाओ तो अरबों-खरबों जानवर थे, हज़ारों-लाखों प्रजातियों के; और मनुष्य थे कुछ लाख, अधिक-से-अधिक। अब आदमी हो गए हैं ८ अरब और जानवर बचे हैं (हाथों से कम मात्रा दर्शाते हुए) इतने से!
साहब!
जानवर भी कौन से बचे हैं बताइए? जो मनुष्य के…

बहुत मोटी मार पड़ती है ठीक तब जब तुम्हें ज़रा भी अंदेशा नहीं होता कि मार खाने वाले हो। माया भी कोई छोटी-मोटी खिलाड़न थोड़े ही है। बेहोशों को छोड़ देती है, वह कहती है, “यह तो पहले ही गिरा हुआ है इसको क्या गिराएँ? शू!” वह भी पसंद करती…

माया एक औसत ज़िंदगी का नाम है।
उफ्! कैसे पकड़ोगे?
द एवरेज लाइफ़!
माया, वो चेहरा है जिसमें कुछ खास नहीं। तुम उसे याद ही नहीं रख सकते, इतना साधारण चेहरा है माया। माया जीवन के उन दिनों, उन घण्टों, उन हफ़्तों, उन पलों का नाम है जिनमें कुछ खास

पृथ्वी पर नहीं है इतने संसाधन कि तुम बच्चे पैदा करे ही जा रहे हो, करे ही जा रहे हो। और मैं जो बोलूँगा वो बात बहुत चुभेगी, बता देता हूँ!
इस समय पृथ्वी पर बच्चा पैदा होने से ज़्यादा अशुभ काम दूसरा नहीं है। मातम का काम है अगर…

अहंशब्देन विख्यात एक एव स्थित: पर:। स्थूलस्त्वनेकतां प्राप्त: कथं स्याद्देहक: पुमान्।।
“ ‘अहं’ शब्द से प्रसिद्ध परमात्मा एकमात्र स्थित है, अर्थात् वह अनेक तत्वों का संघात नहीं है। फिर जो स्थूल है और अनेक भावों को प्राप्त हो रहा है, वह देह पुरुष कैसे हो सकता है?”
~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ३१)

हरि है खांड रेत मांहि बिखरी, हाथी चुनी न जाई। कहैं कबीर गुरु भली बुझाई, चींटी होय के खाई।। ~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) कबीर साहब का एक श्लोक भेजा है, कह रहे हैं कि इसका अर्थ बताएँ। और कहते हैं कि “इन्होंने भी नित्य और अनित्य…

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति।।
जो पुरुष अंतरात्मा में ही सुखवाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म परमात्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त सांख्य योगी शांत ब्रह्म को प्राप्त होता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ५, श्लोक २४…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बताया तो बहुत गया है कि विषम परिस्थितियों में भी व्यवहार कैसा करें पर जब वैसी विपरीत या विषम परिस्थितियाँ सामने आती हैं, तब सारा ज्ञान हिरा जाता है (खो जाता है) और आदमी अपना आपा खो बैठता है।
आचार्य प्रशांत: वह तो होगा ही, ज्ञान से…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, कभी-कभार संसार निरर्थक लगता है लेकिन ज़्यादा समय संसार ही सच लगता है। दिल है कि मानता नहीं, क्या करें? आपके चरणो में आश्रय दो।
आचार्य प्रशांत: संसार सच लगता है तो कोई ग़लती नहीं हो गई। झूठ भी नहीं है संसार। बात सच-झूठ की नहीं…

आचार्य प्रशांत: जीवात्मा प्रकर्ति से युक्त है। युक्त माने? जुड़ा हुआ, योग में। जो चीज़ किसी से योग में हो उसे कहते हैं युक्त। जीवात्मा त्रिगुणी प्रकृति से योग में है तो जीवात्मा गुणों से युक्त है। जीवात्मा प्रकृति से योग में है इसका क्या अर्थ है?
बात समझते चलिएगा।…

आचार्य प्रशांत: विश्व है, पूरा ब्रह्मांड ही है — ऐसा किसको लगता है? विश्व है भी इसका प्रमाण, या गवाह, या अनुभोक्ता कौन है? अहं है और मात्र अहं है उसके अलावा कोई नहीं है। आप ही हैं जिसके लिए ये विश्व है। यह तो छोड़िए कि आप नहीं रहेंगे…

रोबिन सिंह: बहुत से जो लोग हैं उनको होता है कि भाई अभी तो हम दूध ले रहे हैं इस चक्कर में गाय की कुछ क़दर तो है। अगर दूध को आप बहिष्कार करने को कह दो तो गाय की बिलकुल ही बेकद्री हो जाएगी।
आचार्य प्रशांत: बात तो ये…

आचार्य प्रशांत: प्रश्नकर्ता ने तर्क भेजा है, कह रहे हैं, "विटामिन बी12 सिर्फ जानवरों के माँस से ही मिल सकता है और अगर उसको कृत्रिम रूप से लेंगे तो शरीर फिर उसको सोख नहीं पाता।"
बी12 को थोड़ा समझते हैं। देखिए, कोई जानवर अपने शरीर में विशेषतया विटामिन बी12 नहीं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी कुछ समय पहले यूनाइटेड नेशंस का एक ट्वीट आया था उसमें उन्होंने कहा था कि माँसाहार क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) के प्रमुख कारणों में से एक है इसलिए माँसाहार कम करें। तो यह ट्वीट आया और फिर कुछ घण्टों में या एक दिन के अंदर वो ट्वीट…

आचार्य प्रशांत: टीवी पर लिसियस और इस तरह की कंपनियाँ हैं वो अब सीधे-सीधे बच्चों का इस्तेमाल करके लोगों को माँस खाने की ओर ललचा रही हैं।
जो हिंदुस्तानियों के पसंदीदा फिल्मी कलाकार हैं वो इन कम्पनियों के विज्ञापन में काम कर रहे हैं और वो विज्ञापन हर घर में…

प्रश्नकर्ता १: मेरा ऐसा तर्क है कि माँसाहार शाकाहार दोनों ही प्रकृति के संतुलन हेतु आवश्यक हैं। आप कल्पना करें कि यदि पूरी मानव जाति शाकाहारी हो गई तो पानी में मछलियाँ कितनी ज़्यादा हो जाएँगी? और गाँव शहर में सूअर, बकरे-बकरी कितने ज़्यादा हो जाएँगे? कल्पना करना मुश्किल है।…

प्रश्नकर्ता: जब मेरे मज़हब में कुछ जानवरों के माँस को हलाल बताया गया है तो फिर मैं माँस क्यों ना खाऊँ?
आचार्य प्रशांत: हलाल बताया गया है माने अनुमति ही तो दी गई है न, अनिवार्य तो नहीं कर दिया गया। अलाउड और कंपलसरी में अंतर होता है न। और…

प्रश्नकर्ता: बकरीद आ रही है, और मैं उन संस्थाओं का समर्थन करता हूँ जो कि पी.सी.ए. एक्ट (अधिनियम) है, प्रीवेंशन ऑफ क्रुएलिटी टुवर्ड्स एनिमल्स ( पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम- 1960), उसके सेक्शन अट्ठाईस को हटाने की माँग कर रहे हैं। उसका जो सेक्शन अट्ठाईस है वो कहता…

प्रश्नकर्ता: पौधों में भी तो जान होती है, पौधों में भी तो भावनाएँ होती हैं, और पौधे भी तो दर्द का अनुभव कर सकते हैं। तो हमें उन्हें भी तो फिर भोजन के लिए नहीं मारना चाहिए। तो आप चाहे शाकाहारी हों, वीगन हों या माँसाहारी हों, एक ही बात…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बहुत पहले से देख रहा हूँ। इमैजिनेशन (कल्पनाएँ करने) की आदत है। अब यहाँ तीन महीने से हूँ तो इसे और गहराई से देखने के लिए मिला। बहुत ज़्यादा गहराई तक है यह।
मैं सही-सही बताऊँ तो कोई मुझसे बात करता है तो मुझे उसकी आधी बात…

आचार्य प्रशांत: राघव ने प्रश्न पूछा है, कहते हैं, “आचार्य जी प्रणाम, ज़िन्दगी में लगातार एक अभाव का विचार बना रहता है। जब किसी चीज़ में डूब जाता हूँ, या जब संतों को सुनता हूँ और पढ़ता हूँ, तो वो चला जाता है, लेकिन पुनः वापस आ जाता है। कोई…

प्रश्नकर्ता: कहते हैं कि जैसे ही इंसान भक्ति की तरफ़ बढ़ता है, तो प्रकृति उसमें बहुत अड़चनें डालती है, माया बहुत अड़चनें डालती है। हमारे इधर बिरादरी में एक महात्मा जी रहे थे, महात्मा मंगतराम जी, उन्नीस-सौ-तिरपन में उनका देहांत हो गया था, तो उन्होंने भी बहुत - मतलब जैसे…

"या तो पापनाशक जल वाले गंगा तट पर निवास करें या फ़िर मनोहर हार वाले तरुणी स्त्री के वक्षस्थल पर।" ~(श्रृंगार शतकम्, श्लोक ३०)
आचर्य प्रशांत: कमलेश कह रहे हैं, "तीसवाँ श्लोक बहुत अच्छा है, बता दीजिए।''
कमलेश! (प्रश्नकर्ता की तरफ देखते हैं)

आचार्य प्रशांत: पूछा है कि, "कबीर साहब कह गए हैं कि;
कोटि नाम संसार में, तासे मुक्ति ना होए। आदि नाम जो गुप्त है, बूझे बिरला कोए।। ~कबीर साहब
तो इसमें किस नाम की बात हो रही है? फिर आगे कहते हैं कि ऐसे ही तुलसीदास कह गए हैं कि…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी को प्रणाम। आचार्य जी, कबीर दास जी कहते हैं , "लूट सको तो लूट लो, राम नाम की लूट। पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाएँ जब छूट।" तो राम नाम की लूट से क्या आशय है? कृपया प्रकाश डालें और प्रणाम स्वीकार करें।
आचार्य प्रशांत: कपिल (प्रश्नकर्ता), जीवन…

आचार्य प्रशांत: आलोक जी कह रहे है कि आचार्य जी अब कुछ उल्टा होने लगा है। दुनिया महत्वपूर्ण लगने लगी है। मौत का क्यों सोचूं, जीवन भी तो अच्छा ही लगने लगा। आत्मा को खोजने की ज़रूरत ज़रा कम हो गई है, क्योंकि शरीर भी तो बढ़िया चीज़ है। पेड़,…
आचार्य प्रशांत: बेटा, किस …
The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.
अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15
कह रहे हैं कि,…

आचार्य प्रशांत: सत्य को मायापति कहा गया है; समझते हैं। माया क्या? वो जो हमें प्रतीत होता है, जिसकी हस्ती के बारे में हमें पूरा विश्वास हो जाता है, पर कुछ ही देर बाद या किसी और जगह पर, किसी और स्थिति में हम पाते हैं कि वो जो बड़ा…

प्रश्नकर्ता: प्रकृति हमारे प्रति इतनी बेरहम और असम्वेदनशील क्यों होती है?
आचार्य प्रशांत: प्रकृति ने ऐसा क्या किया भाई? तुम प्रकृति ही हो, तुम प्रकृति के वो विशिष्ट उत्पाद हो जिसके माध्यम से स्वयं प्रकृति निर्वाण खोज रही है। मैं बार-बार कहता हूँ न कि तुम अहंकार हो; अहंकार कोई…

आचार्य प्रशांत: कोई ऐसा नहीं है जो समाप्त हो जाना चाहता हो। बड़ी अजीब बात है ये; कोई आयु हो, कोई वर्ण हो, कोई रंग हो, कोई लिंग हो, कोई देश हो, कोई काल हो - जैसे हम सब के भीतर बने रहने की एक निरंतर अभीप्सा रहती है। कोई…

आचार्य प्रशांत: देखो प्रकृति से, संसार से भागा नहीं जा सकता, लेकिन प्रकृति और संसार तुम्हारे लिए आख़िरी चीज़ भी नहीं हो सकते। बहुत ध्यान से समझो इस बात को। ना इनसे भाग सकते हो—किससे?—दुनिया से, संसार से। अपने शरीर से बाहर निकलकर भाग सकते हो? तो संसार से बाहर…

प्रश्नकर्ता: पश्चिम में जानवरों का मांस और जानवरों से उत्पन्न उत्पाद को खाने में प्रचूरता से उपयोग में लाया जाता है। पश्चिम के लोग शारीरिक दृष्टि से भी संमृद्ध हैं और आर्थिक दृष्टि से भी।
तो क्या प्रकृति को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता? और अगर पड़ता है तो किस…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते! हाल ही में एक हथिनी की हत्या के संबंध में देश में बहुत खलबली रही। आचार्य जी उस हथिनी में ऐसा क्या था कि पूरा देश ही भावुक हो गया? वो लोग भी जो रोज़ जानवर खाते हैं वो सोशल मीडिया पर आकर बयान देने लग…

प्रसंग:
प्रभु का रूप अतुल्य है
मन्दोदरी ने रावण से कहा, “यदि तुम्हें सीता को पाने की इतनी ही इच्छा है, तो तुम उसके पास राम का रूप धारण करके क्यों नहीं चले जाते?” तुम तो मायावी हो, माया का इतना उपयोग तो कर ही सकते हो। रावण ने उत्तर…