
लड़कीवाले लड़की देने को राज़ी नहीं होते अगर सरकारी नौकरी नहीं है। और कोई वजह हो-न-हो, वंश चलाने की ख़ातिर हमें यूपीएससी निकालना पड़ेगा। ‘वंश चलाने के लिए यूपीएससी निकालना पड़ेगा!’ यह सब तो तुम्हारे सारे कारण हैं सरकारी नौकरी के पीछे जाने के, नहीं तो और तुम क्यों इतने…

सबसे पहले यह समझो कि दूसरे तुम में कमज़ोरी देख रहे हैं न, इसीलिए तुम पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। अगर वह तुममे कमज़ोरी देखेंगे ही नहीं तो तुम पर चढ़ने की कोशिश भी नहीं करेंगे। बात यह नहीं है कि उसने जो भी कहा है वह सही…

ना संसार से डरो, ना सरकार से डरो, ना डरो दुनिया के तानों से, ना डरो अधूरे अरमानों से, डरो तो बस ज़िंदगी के बर्बाद चले जाने से। घड़ी की टिक-टिक को अपना दोस्त बना लो, हर घण्टे-दो- घण्टे पूछा करो अपने-आप से, “अपने समय का जो मैं ऊँचे-से-ऊँचा, बढ़िया-से-बढ़िया…

पढ़ाई में मन नहीं लगता क्योंकि वो पढ़ाई शायद तुम्हारे लिए है ही नहीं। वो पढ़ाई तुम कर ही रहे हो उनके दबाव में जो तुमको एक तरह से स्पॉन्सर कर रहे हैं कि ‘तू घर बैठ, तुझे रोटी-पानी की फ़िक्र करने की अभी कोई ज़रूरत नहीं साल-दो-साल, तू बैठ…

दुनिया में एक-से-बढ़कर-एक प्रकाशित स्त्रियाँ हुईं हैं, जाओ उन्हें चाहो, बिलकुल उनके प्रेम में पड़ जाओ, न्योछावर हो जाओ उनपर, तुम्हारी ज़िंदगी बन जाएगी। पर तुम ऐसा करते नहीं। ऊँची स्त्रियों से तुम्हें भय लगता है, क्योंकि ऊँची स्त्री के पास जाकर के तुम अपना बौनापन बरक़रार नहीं रख सकते।…

दुनिया की ताक़तों से, और घरवालों से, और पचास लोगों से डरते हो इस बात से भी तो डरो कि, ‘जन्म ही व्यर्थ हो गया तो?’
जीवन से छोटे-मोटे डर सब हटाने हों तो बड़ा डर ले आओ। और बड़ा डर यही है – कल्पना में तो खोए ही रहते…

अकसर जो नंगा होता जाता है उसको हम लिख देते हैं, “ये तो बोल्ड (निर्भीक) कपड़ों में आया है।“ उसमें बोल्डनेस (निर्भीकता) क्या है? फिर तो सबसे बोल्ड जानवर हुए। एक गधा तो बोल्डनेस की प्रतिमूर्ति हो गया, उसे बोल्डनेस का नोबेल प्राइज़ मिलना चाहिए, उसने ज़िन्दगी में कोई कपड़ा…

एक ज़िंदगी है, दबे-दबे जीने में क्या मज़ा है भाई? तुम किस चीज़ को सुरक्षित कर रहे हो? जीवन माने समय ही तो होता है न? डरे-डरे समय बिता रहे हो, तो तुमने सुरक्षित किस चीज़ को रख लिया है? समय डर में बिता दिया तो तुमने बचा क्या लिया?…

जो आपको डराने आए, वो आपको छोटी धमकी देता है। उसको आप कहिए, “तू आ कर बैठ! तू तो छोटी धमकी दे रहा है, मुझे तो पूरी बात पता है।“ पूरी बात क्या? यहाँ से एक पैसा और शरीर की एक कोशिका ले कर के हम बचने नहीं वाले, बाहर…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में कुछ-न-कुछ कहानियाँ सुनते रहते हैं, आखिर मृत्यु के बाद क्या होता है?
आचार्य प्रशांत: पहेली है ये, कुछ है ही नहीं मृत्यु के बाद। संसार ही नहीं है, तुम्हारे ही देखे संसार है तुम्हारे ही देखे समय है।…

दुर्लभ मानुष जन्म है, मिले न बारम्बार। तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।।
~ कबीर साहब
प्रश्नकर्ता: सत्य की साधना में यह मनुष्य का शरीर ही अवरोध बनती है तो इसे ही दुर्लभ क्यों कहा गया है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, आपका एक वीडियो देखा जिसमें आप बता रहे थे कि शरीर की औकात राख भर की है। ये तो हमें भी पता है कि एक दिन मरना है। पर मौत के डर से क्या जीवन का आनंद लेना छोड़ दिया जाए?
आचार्य प्रशांत: अरे नहीं, क्या…

प्रश्नकर्ता: आपके वीडियोज़ देख कर समझ आ गया है कि अगर निर्भरता न हो तो डर नहीं आता। किसी भी उपलब्धि को गंभीरता से ना लिया जाए तो डर नहीं होता और डर हटाने के बाद मन को कुछ अच्छा देना होता है। यह छोटे-मोटे डर को पार करना आसान…

प्रश्नकर्ता: मेरा एक दोस्त है वो ये भूत-प्रेत वगैरह सब में बहुत ज़्यादा विश्वास करता है। हालाँकि पढ़ा-लिखा है वेल एजुकेटेड है लेकिन पता नहीं क्यों ऐसा है। तो बहुत उससे डिस्कशन (चर्चा) हुआ, काफ़ी सारे लॉजिक (तर्क) उसने भी दिए। मैंने कहा — भई मैंने तो कभी नहीं देखे,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कुछ मुद्दे हैं जिनपर आप पिछले दस साल से बोल रहे हैं, जैसे — आत्मा, चेतना, मन, मृत्यु, पुनर्जन्म। हाल ही में बातचीत सीरीज़ (श्रंखला) के माध्यम से आपने इनपर स्पष्टता भी दी है, फिर भी कई लोग हैं जो एक ही सवाल बार-बार घुमाकर अन्य तमाम…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपके हज़ारों वीडियोस हैं यूट्यूब पर, हर वीडियो में आपने किसी-न-किसी तरीके से धर्म या अध्यात्म की ही बात करी है — उपनिषद्, ब्रह्म, धर्म, अध्यात्म, भगवान। ये सब मिलकर भी दुनिया में जो इतना पाप, दु:ख, युद्ध, क्लेश, अवसाद, बलात्कार, हत्या इत्यादि है उसका आजतक खात्मा…

प्रश्नकर्ता: मेरी उम्र तैंतीस वर्ष है, और मैं एक नामी आईटी कंपनी में इंजीनियर हूँ। कोरोना काल में आपकी वीडियोज़ सुनना अधिक बढ़ गया। सर, आज से तीन साल पहले अचानक मेरी नौकरी छूटी थी। उसके तीन महीने बाद सब ठीक भी हो गया था। परंतु उस घटना ने मुझे…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे ऐसा लगता है कि मेरे अंदर जो डर है, पहले मुझे उसका सामना करना पड़ेगा, तो ही मैं मुक्त हो पाऊँगा। क्या यह मेरी धारणा है?
आचार्य प्रशांत: नहीं, हिम्मत के पास हमेशा एक तर्क होता है, और डर के पास भी हमेशा एक तर्क होता…

आचार्य प्रशांत: दबाव तो आप तभी बर्दाश्त करते हो जब उसमें मुनाफा दिख रहा हो। मुनाफा जिसको चाहिए वो वही है जो सोचता है कि अभी कुछ कमी है।
सत्र के आरंभ में ही हमने कहा था कि अहंता की परिभाषा ही यही है कि वो हमेशा कुछ-न-कुछ कम पाती…

आचार्य प्रशांत: परेश को अक्सर लगता है कि कोई उसे चेक कर रहा है, और ये चीज़ उसे असहज कर देती है।
छोटे बच्चों की क्लास होती है, छोटे बच्चे; उनकी टीचर सामने बैठती है उनकी कॉपी वगैरह ले कर के। उनके भी एग्जाम (परीक्षा) के पेपर होते हैं, वह…

प्रश्नकर्ता: मुझ से अतीत में अज्ञानवश कुछ ऐसे कर्म हुए हैं जो आज मुझे गलत लगते हैं व ग्लानि देते हैं। सकाम कर्म नहीं हुआ है इंडिरेक्टली (परोक्ष रूप से) हुआ है। मुझे इस ग्लानि से कैसे मुक्ति मिले? वो ग्लानि झूठ है ये तो अज्ञानी मन नहीं मानता। वो…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, धोखे का डर रहता है। उसको कैसे दूर करें?
आचार्य प्रशांत: तो धोखे का थोड़े ही तुम्हें डर रहता है, तुम्हें तो डर ये रहता है कुछ खो ना जाए। धोखे से तुम्हें एक लाख रुपए मिल जाएँ तो डर लगेगा?
धोखे का थोड़े ही डर है।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरी प्रवृत्ति कुछ ऐसी है कि ज़्यादातर समय मेरा डर में ही व्यतीत होता है। डर मतलब जो अभी है वो खो जाने का डर, कुछ अनहोनी हो जाने का डर। कृपया इस समस्या से उभरने के लिए कोई मार्गदर्शन दिखाएँ।
आचार्य प्रशांत: डर कभी भी झूठा…

When people do not fear what they ought to fear, that which is their great dread will come on them – Lao Tzu
जीवन के सबसे बड़े ख़ौफ़ को आमंत्रण है उस भय से विमुख हो जाना जिससे भयभीत होना ज़रूरी है। – लाओ-त्सु
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। लाओ-त्सु ने…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं पिछले दो-तीन महीने से अध्यात्म में हूँ। थोड़े समय से बिलकुल सही चल रहा था। जब तक मन और बुद्धि पर काम हो रहा था तो ज़्यादा डर नहीं था। पिछले हफ्ते कुछ ऐसा हुआ कि बहुत ज़्यादा डर लगने लगा। मैं जिनसे सीख रही…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं कुछ भी करने बैठूँ जैसे पढ़ने बैठूँ, योगा करूँ, मैडिटेशन करूँ, यहाँ तक कि जब मैं आपसे ये सवाल भी पूछ रहा हूँ तो ये सवाल पूछते हुए भी मेरे दिमाग में कुछ और चल रहा है। तो प्रश्न ये है कि मन को नियंत्रित कैसे…

ब्राह्यान्तराणां शत्रूणां स्वभावं पश्य भारत। यन्न पश्यति तद्भूतं मुच्यते स महाभयात् ॥ -कामगीता (श्लोक ८)
अनुवाद: भारत! बाहरी और भीतरी शत्रुओं के स्वभाव को देखिए-समझिए। (ये मायामय होने के कारण मिथ्या हैं, ऐसा निश्चय कीजिए)। जो मायिक पदार्थों को ममत्व की दृष्टि से नहीं देखता, वह महान भय से छुटकारा…

प्रश्नकर्ता: सर, ये फोमो क्या है, फियर ऑफ मिसिंग आउट (पीछे छूट जाने का डर)? मुझे भी बहुत डर लगता है कि दूसरे लोग जिन चीज़ों का अनुभव ले रहे हैं, आनंद ले रहे हैं कहीं मैं उन चीज़ों से वंचित न रह जाऊँ। मैं कुछ समय से आपको सुन…

प्रश्नकर्ता: जब अपने मन को और विचारों को देखता हूँ तो डर जाता हूँ, हाथ-पाँव तक काँपने लगते हैं। मन को और अपनी वृत्तियों को देख पाने का साहस कैसे आएगा?
आचार्य प्रशांत: मन मलिन है कोई शक नहीं, वृत्तियों में विकार है कोई शक नहीं, और बात घाटे की…

प्रश्नकर्ता: मुझे ये जानना है कि जैसे कोई भी परिस्थिति आ जाती है जैसे कि मान लीजिए कि कोई गाड़ी वाला आ रहा है और मैं उस गाड़ी वाले के सामने आ गया और मैं एकदम बीच में रुका हुआ हूँ। और वो गुस्से में मुझे देख रहा है, मैंने…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मेरे अंदर डर बहुत है। अपने सामाजिक स्तर की वजह से मैं सबके सामने अच्छा बन कर दिखाना चाहता हूँ और यह भी मुझे लगता है कि अगर मैंने डर हटाया तो अहम् बड़ा हो जाएगा। मैं डर को हटाना भी चाहता हूँ और मैं ही उसे…

प्रश्नकर्ता: सात साल पहले मेरे परिवार में एक दुर्घटना हुई थी। मेरी मम्मी और मेरे भाई की मृत्यु हो गई। मेरे मामा जी गाड़ी चला रहे थे तो मामा जी को नींद आ गई थी। मामा जी तो ठीक हैं, उनको इतनी ज्यादा कुछ चोट नहीं लगी मगर मेरी मम्मी…

प्रश्नकर्ता: मृत्यु से डर लगता है। क्या मृत्यु के साथ सब समाप्त हो जाता है?
आचार्य प्रशांत: ये घर है तुम्हारा (सत्संग के कमरे को बताते हुए)। मौत का मतलब इसमें आग लग जाएगी। ठीक है? अभी जीवन है तो ये घर है। (कमरे में रखी वस्तुओं को बताते हुए)…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कोई भी काम करने से पहले मेरे दिमाग में प्रश्न उठने लगता है कि ये काम होगा कि नहीं। जैसे कोई पेपर देने जाता हूँ तो पहले ये होता है कि फेल हो गया तो क्या होगा। ऐसा क्यों होता है आचार्य जी?
आचार्य प्रशांत: क्योंकि तुम्हें …

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, भय, निर्भय और अभयㄧइनमें भेद क्या है?
आचार्य प्रशांत: आप अपनी हालत बताओ। यहाँ पहाड़ पर तीन तरह के पेड़ होते हैं, एक पेड़ का नाम है भय, एक का नाम है निर्भय, एक का नाम है अभय। मैं देने लगूँ जानकारी, तुम्हें क्या मिलेगा? तीन तरह…

आचार्य प्रशांत: प्रश्नकर्ता बच्चा है छोटा। सवाल कर रहा है कि जब कोई बुरी घटना हो जाती है जैसे किसी की मृत्यु इत्यादि या कोई दुर्घटना, तो फिर वो बहुत दिन तक मन को सताती है, रातों को नींद इत्यादि भी नहीं आती। ऐसा क्यों होता है?
बेटा, ऐसा इसलिए…

प्रश्नकर्ता: मैं बहुत व्यग्र और चिंतित रहता हूँ, मैं अपनी ओर से पूरा प्रयास कर रहा हूँ कि शांति में जिऊँ। मैं अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक समस्याओं के कारण डरा रहता हूँ, मैं निर्भय होना चाहता हूँ, मैं क्या करुँ?
आचार्य प्रशांत: ‘मैं व्यग्र-चिंतित रहता हूँ और डरा रहता हूँ,’…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरे जीवन की जो समस्या मुझे समझ आती है, वो ये है कि मेरे अंदर संसार को लेकर भय है। भय जैसे मेरे अंदर जड़ बनाकर बैठ ही गया है। मुझे अजनबी लोगों और परिस्थितियों पर बिना किसी कारण ही संदेह उठता है और डर तो…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। इस गीत में प्यार का मतलब प्रतीत होता है किसी व्यक्ति के प्रति गहरा आकर्षण। मैंने खुद की ज़िन्दगी में भी ये महसूस किया है कि किन्हीं व्यक्तियों को देखते या सुनते ही अचानक एक जुड़ाव अनुभव होता है और बाद में समय के साथ यह…

प्रश्नकर्ता: क्या कुछ लोग प्राकृतिक तौर पर निडर और आध्यात्मिक होते हैं?
आचार्य प्रशांत: अध्यात्म के रास्ते पर जितना हानिप्रद है यह कहना कि मैं कायर हूँ उतना ही हानिप्रद है मानना कि मैं वीर हूँ। जैविकरूप से, निश्चितरूप से ऐसा हो सकता है कि जैसे तुमने कहा कि एक…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पिछले सत्रों में आपने जो विधि बताई थी, उससे काफ़ी वासनायें इंद्रियों के द्वार पर खड़ी रहती हैं, मैं भाव करता हूँ लेकिन छूट-छूट जाता है, और फिर एक डर लगता है कि जैसे पहले हम इनसे पकड़ जाते थे, फिर पकड़ जाएँगे। तो वो डर क्यों…

हमरी करो हाथ दै रक्षा॥
पूरन होइ चित की इछा॥
तव चरनन मन रहै हमारा॥
अपना जान करो प्रतिपारा॥

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं तो सच की राह पर ही चलना चाहता हूँ मेरे हिसाब से, लेकिन परिवार वाले कहते हैं, "तुम ज़िम्मेदारी निभाओ!" मतलब जो भी सामाजिक दायित्व हैं उनको पूरा करो, फैमिली (परिवार) बनाओ।
आचार्य प्रशांत: उनको बोलो, "फिर तुम काहे के लिए हो? हम ही सब करेंगे…


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी डर की बात हो रही है। मेरा बच्चा चार साल का है। अभी कुछ समय से वो किसी अँधेरे कमरे में जाने से, या अँधेरा हो जाने पर, बहुत डरने लगा है। कोई वजह नहीं बताता है, पर बहुत डरने लगा है।
ऐसा क्यों?
आचार्य प्रशांत:…

प्रश्न: आचार्य जी, दर और सावधानी क्या एक ही चीज़ हैं?
आचार्य प्रशांत जी: दो-तीन बातें हैं, उन्हें समझ लेंगे तो स्पष्ट हो जाएगा। सावधानी कभी-भी मन में डेरा डालकर नहीं बैठती। तुम गाड़ी चला रहे हो, चला रहे हो, सामने कोई आ गया, तुम क्या करते हो? ब्रेक लगा…

प्रश्न: हमें कभी लगता है कि हम सही हैं, और हम वही चीज़ कर रहे हैं, पर हमें उस रास्ते पर लोगों के इतने कटाक्ष मिलते हैं कि हम उस रास्ते पर चल ही नहीं पाते।
आचार्य प्रशांत जी: डर लगा रहता है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप आइ.आइ.टी., आइ.आइ.एम. से पढ़े, और फिर आइ.ए.एस. भी थे, फिर आपने ये सब छोड़ दिया। तो आपके भी कुछ संकोच रहे होंगे। या फिर परिस्थितियाँ कैसी थी कि आपने सबकुछ छोड़ दिया, इसकी प्रेरणा कहाँ से मिली आपको?
आचार्य प्रशांत: दूर से देखो तो ऐसा…

प्रश्न: आचार्य जी, हम ज़िन्दगी में कुछ भी प्रयास करते हैं, जो सफलता के लिए होता है, उससे हमेशा डरते क्यों हैं? डर-डर के क्यों करते हैं?
आचार्य प्रशांत: क्योंकि तुम प्रयास पर कम और उसके फल पर ज़्यादा ध्यान दे रहे होते हो। तुम्हें इस बात से…

आचार्य प्रशांत: मनीष ने कहा है कि जब भी कोई अच्छा काम करना चाहता हूँ, तो भीतर से एक डर उठता है जो उस काम को करने से रोकता है । सत्र में आने से पहले भी ऐसा ही होता है ।
तो तुम आ गए ना सत्र में?…
आचार्य प्रशांत: मैं सवाल समझा देता हूँ सबको। कह रहे हैं…
अर्थात, हे! अकाल पूरक, अपना हाथ देकर मेरी रक्षा करो। मेरी मन की यह इच्छा आपकी कृपा द्वारा पूरी हो कि मेरा मन सदा आपके चरणों में जुड़ा…
प्रश्नकर्ता: डर जो होता है हमें हमेशा हो आउटवार्डली रखता है उसकी वजह से ये जो गहराई है यानी कि व्यवहार में एक तरह का संतुलन रहे, इधर के भी ज्ञान रहे और उधर का भी तब जा कर आप फिर एक तरफ के पूरी तरह से हो पाते हो…
प्रश्नकर्ता: अट्ठारह!…