
Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…

प्रश्नकर्ता : आचार्य जी, अध्यात्म उपनिषद् कहता है कि तुम अहंकार को गला दो, देख लो कि तुम ये भी नहीं हो, वो भी नहीं हो। तो जो देखने वाला है, वो भी तो अहंकार ही है? कृपया प्रकाश डालें। आचार्य प्रशांत : सवाल ये है कि, “उपनिषद् कहता है…

◾ एक ही जाति होती है - वह है "बल"। बल विकसित करो अपने भीतर।
◾ आत्मा का इस पूरे देह व्यापार से कोई लेना देना ही नहीं।

यदा नाहं तदा मोक्षो
यदाहं बन्धनं तदा।
मत्वेति हेलया किंचिन्-
मा गृहाण विमुंच मा॥८- ४॥

न दूरं न च सङ्कोचाल्लब्धमेवात्मनः पदम्। निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम्॥
आत्मा का स्वरुप न दूर है, न निकट। वह तो प्राप्त ही है, तुम स्वयं ही हो। उसमें न विकल्प है, न प्रयत्न है, न प्रकार है और न मल।

अर्जयित्वाखिलानर्थान् भोगानाप्नोति पुष्कलान्। न हि सर्वपरित्यागमन्तरेण सुखी भवेत्॥
कोई जगत के समस्त पदार्थों का उपार्जन करके अधिक-से-अधिक भोग प्राप्त कर सकता है, परन्तु सबका परित्याग किए बिना कोई सुखी नहीं हो सकता।
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक २

"मुक्ति के लिए अपने मन से वस्तुओं के उपभोग की इच्छा को विष की तरह त्याग दो, क्षमा, सरलता, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत की तरह सेवन करो" ~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १, श्लोक २
आचार्य प्रशांत: अष्टावक्र गीता, पहला अध्याय, दूसरा श्लोक।
अष्टावक्र दया की बात क्यों कर…

विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान्।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः॥५३ ||
~ अष्टावक्र गीता

आत्मा ब्रीति निश्चित्य भावाभावी च कल्पिती।
निष्कामः कि विजानाति किं ब्रूते च करोति किम्॥
~ अष्टावक्र गीता

क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्वन्धं करोति वै।
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदासावकृत्रिमः।।
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 18 श्लोक 41)

तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढतां।
अथवा याति संकोचम - मूढः कोऽपि मूढवत्॥
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 18 श्लोक 32)

कुत्रापिन जिहासास्ति नाशो वापि न कुत्रचित्।
आत्मारामस्यधीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः॥
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय १८ , श्लोक २३)

अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रयदूषितं।
असारं निन्दितं हेयमि ति निश्चित्य शाम्यति॥९- ३॥
अनुवाद: यह सब अनित्य है, तीन प्रकार के कष्टों (दैहिक, दैविक और भौतिक) से घिरा है, सारहीन है, निंदनीय है, त्याग करने योग्य है, ऐसा निश्चित करके ही शांति प्राप्त होती है।

निर्वासनो निरालंब: स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः । क्षिप्त: संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ।।
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक २१
अनुवाद: वह वासना, आलंबन, परतंत्रता आदि के बंधनों से स्वच्छंद होता है। प्रारब्ध रूपी वायु के वेग से उसका शरीर उसी प्रकार गतिशील रहता है, जैसे वायु वेग से सूखा पत्ता।

प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठते सुखम्।।
~अष्टावक्र गीता
अध्याय १८, श्लोक २०

असंसारस्य तु क्वापिन हर्षो न विषादिता। स शीतलहमना नित्यं विदेह इव राजये॥
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक २२
अनुवाद: संसार मुक्त पुरुष को ना कहीं कोई हर्ष होता है, ना विषाद, उसका मन सदा शीतल होता है और वह विदेह के समान शोभायमान होता है।

ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवं।
अज्ञानाद् भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरंजनः॥ २-१५॥
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता यह तीनों वास्तव में नहीं हैं, यह जो अज्ञानवश दिखाई देता है वह निष्कलंक मैं ही हूँ

क्व मोहः क्व च वा विश्व क्व तद् ध्यानं क्व मुक्तता ।
सर्वसंकल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः ॥
~ अष्टावक्र गीता
( अध्याय १८ श्लोक १४ )

कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्।।१३.२।।
अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ(अर्थात् नहीं) हैं, वाणी के दुःख भी कहाँ हैं, वहाँ मन भी कहाँ है, सभी प्रयत्नों को त्याग कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ।

समस्त कल्पनामात्र - मात्मा मुक्तः सनातनः।
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत्॥
~ अष्टावक्र गीता

व्यामोहमात्रविरतौस्वरूपादानमात्रतः।
वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः ॥६॥
अनुवाद: अज्ञान मात्र की निवृत्ति होते ही, तथा स्वरूप का बोध होते ही, दृष्टि का आवरण भंग हो जाता है और तत्वज्ञ पुरुष शोकरहित होकर शोभायमान होते हैं।

विहाय वैरिणं कामम-र्थं चानर्थसंकुलं।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रा ना दरं कुरु॥१०- १॥
अनुवाद: जब तक जीवन स्वार्थों के पीछे भाग रहा है, तब तक जीवन में आनंद का होना ना मुमकिन है।

भवोऽयं भावनामात्रो न किंचित्परमर्थतः।
नास्त्यभावः स्वभावनां भावाभावविभाविनाम्।।
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 18 श्लोक 4)

सर्वभूतेषु चात्मानं
सर्वभूतानि चात्मनि।
मुनेर्जानत आश्चर्यं
ममत्वमनुवर्तते॥३- ५॥

निर्ध्यातुं चेष्टितुं वापि
यच्चित्तं न प्रवर्तते।
निर्निमित्तमिदं किंतु
निर्ध्यायेति विचेष्टते॥१८- ३१॥

*स्वातंत्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातंत्र्याल्लभते परं। *
स्वातंत्र्यान्निवृतिं गच्छेत्स्वातंत्र्यात् परमं पदम् ॥५०॥
आचार्य प्रशांत: स्वतंत्रता से ही सुख की प्राप्ति होती हैं। स्वतंत्रता से ही परम तत्व की उपलब्धि होती है। स्वतंत्रता से ही परम शांति की प्राप्ति होती है। स्वतंत्रता से ही परम पद मिलता है।

धीरो लोकविपर्यस्तो वर्तमानोऽपि लोकवत्।
नो समाधिं न विक्षेपं न लोपं स्वस्य पश्यति॥१८- १८॥
अनुवाद: तत्त्वज्ञ पुरुष तो संसारियों से उल्टा ही होता है, वह सामान्य लोगों जैसा व्यवहार करता हुआ भी अपने स्वरुप में न समाधि देखता है, न विक्षेप और न लेप ही।

भवोऽयं भावनामात्रो न किंचित् परमर्थतः।
नास्त्यभावः स्वभावनां भावाभावविभाविनाम् ॥१८-४॥
~ अष्टावक्र गीता
अर्थ: विश्व तुम्हारी चेतना में उभरा हुआ एक चित्र है। विश्व तुम्हारी चेतना में उठती-गिरती एक तरंग है। जिसने जान लिया कि क्या अस्तित्वमान है, और क्या अस्तित्वहीन है वह जन्म मरण के पार चला जाता है। वह

येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोतु वै।
निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति॥१५॥
अनुवाद: जिसने इस विश्व को कभी यथार्थ देखा हो, वह कहा करें कि नहीं है, नहीं है,

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, पिछले एक महीने से मैं अष्टावक्र गीता पढ़ रहा हूँ। तो मैंने अपने जीवन में भी देखा, शांति के रास्ते में शरीर और मन बीच-बीच में बाधा बनते हैं। तो इसी विषय पर जब मैंने अष्टावक्र गीता देखा; उसमें दो श्लोक मिले जो इससे रिलेवेंट थे,…

कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात्।
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गताः॥९- २॥
~ अष्टावक्र गीता
हे पुत्र! इस संसार की (व्यर्थ) चेष्टा को देखकर किसी धन्य पुरुष की ही जीने की इच्छा, भोगों के उपभोग की इच्छा और भोजन की इच्छा शांत हो पाती है।

I am not the body, nor have I the body
मैं देह नहीं हूँ, न देह मेरी है
अष्टावक्र गीता, (अध्याय-2, श्लोक-22)

निःसंगो निष्क्रियोऽसि
त्वं स्वप्रकाशो निरंजनः।
अयमेव हि ते बन्धः
समाधिमनुतिष्ठति॥१-१५॥

आचार्य प्रशांत: अष्टावक्र सत्तरवें अध्याय में ‘सव्छेन्द्रियों’ की बात करते हैं, स्वक्ष इन्द्रियाँ। तो प्रिय कह रही हैं की इससे क्या अर्थ हुआ? ‘स्वक्ष इन्द्रिययाँ’ मैं एक ही शब्द बोलूँ अभी, उसको कुछ लोग बड़े साधारण तरीके से सुन लेंगे। कुछ उस पर मुँह बिसोरने लगेंगे। कुछ हँसदेंगे। एक…

निरोधादीनि कर्माणि जहाति जड़धीर्यदि |मनोरथान् प्रलापांश्र्च कर्तुमाप्नोत्यतत्क्षणात् ||
अष्टावक्र गीता
(अध्याय १८, श्लोक ७५)

कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद् भव त्यागपरोऽव्रती॥
~अष्टावक्र गीता (अध्याय९, श्लोक १)

मन्दः श्रुत्वापि तद्वस्तु न जहाति विमूढ़तां|
निर्विकल्पो बहिर्यत्नादन्तर्विष्यलालसः||
~अष्टावक्र गीता (अध्याय-18, श्लोक-76)

अष्टावक्र गीता (अध्याय २ श्लोक १८)
न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्तो निराश्रया।
अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम्।।

वक्ता:अष्टावक्र गीता, ग्यारहवाँ अध्याय, तीसरा श्लोक :
आपदः सम्पदः काले दैवादेवेति निश्चयी
तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वांछति न शोचति

अष्टावक्र गीता – १९ अध्याय, श्लोक ५
क्व स्वप्न: क्व सुषुप्तिर्वा क्व च जागरणम तथा ।
क्व तुरीयं भयं वापि स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ।।

अक्षयं गतसंतापमात्मानं पश्यतो मुने:।
क्व विद्या च क्व वा विश्वं क्व देहोअहम ममेति वा।।
(जो मुनि आत्मा को अक्षय व गतसंताप देखता है, उसके लिए कहाँ विद्या है और कहाँ विश्व है? उसके लिए कहाँ ‘मैं देह हूँ’, और कहाँ ‘देह मेरी है’ की भावना है?)

शुद्धम बुद्धम प्रियं निष्प्रपंचं निरामयां।
आत्मानं तं न जानंति तत्राभ्यासपरा जनाः।।

येन दृष्टम परं ब्रह्म सोऽहं ब्रह्मेति चिन्तयेत्।
किं चिन्तयति निश्चिन्तो यो न पश्यति।।
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक १६

न विक्षेपो न चैकाग्रयं नातिबोधो नमूढता।
न सुखं न च वा दुःखं उपशान्तस्य योगिनः।।
~ अष्टावक्र गीता, श्लोक १०, अध्याय १८

वक्ता: ऋद्धि सिद्धि माँगो नहीं, माँगो तुम पै येह।
निसि दिन दर्शन साधु को, प्रभु कबीर कहुँ देह।।
इसी के साथ कुछ अन्य पंक्तियाँ भी हैं

भवोऽयं भावनामात्रो न किंचित् परमर्थतः।
नास्त्यभाव: स्वभावनां भावाभावविभाविनाम्।।
अष्टावक्र गीता (अध्याय १८, श्लोक ४)

नाविचारसुश्रान्तो धीरो विश्रान्तिमागतः।
न कल्पते न जाति न शृणोति न पश्यति।।
अष्टावक्र गीता (अध्याय १८, श्लोक २७)

अभ्यंतर में जिसकी समस्त आशाएं मलिन हो गयी हैं और जो निश्चय पूर्वक जानता है कि कुछ भी नहीं है,
ऐसा ममता रहित, अहंकार शून्य पुरुष कर्म करता हुआ भी उसमें लिप्त नहीं होता।
– अष्टावक्र गीता, अध्याय १७, श्लोक १९

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज | अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा श्रुचः ||
अनुवाद: सब धर्मों का परित्याग करके तुम एक मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा। तुम शोक मत करो।

कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्।।
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय १३ श्लोक २)
◾ आत्मा का विकृत सिद्धांत ही भारत की दुर्दशा…
आचार्य प्रशांत: "आत्मा…
आचार्य प्रशांत: बता रहे हैं अष्टावक्र कि आए ही क्यों हो…
आचार्य प्रशांत: हमारे भोग भी छोटे होते हैं। और…
अनुवाद: आत्मा ही ब्रह्म है और भाव - अभाव कल्पित हैं, ऐसा निश्चय होते ही निष्काम ज्ञानी फिर क्या जाने, क्या कहे, क्या करे?
अचार्य प्रशांत: जो…
आचार्य…
आचार्य प्रशांत: यह श्लोक कहता है कि…
प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया।…
आचार्य प्रशांत:…
अनुवाद: जो धीर पुरुष है उसका न प्रवृत्ति से, न निवृत्ति से कोई आग्रह होता है। जब जो सामने आ जाता है तब उसे करके वह आनंद से रहता है।
आचार्य प्रशांत:…
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 2 श्लोक १५)
प्रसंग:
"The Self is abstract intelligence free from thought.…
अनुवाद: जो महात्मा समस्त संकल्पों की सीमा पर विश्राम कर रहा है, उसके लिए अज्ञान कहां, विश्व कहां, ध्यान कहां और मुक्ति भी कहां?
आचार्य…
~ अष्टावक्र गीता ( अध्याय -१३ , श्लोक…
अनुवाद: सब कुछ कल्पना मात्र है और आत्मा नित्य मुक्त है। धीरपुरुष इस बात को जानकर फिर बालक के समान क्या अभ्यास करे? अर्थात् ज्ञानी के लिए अभ्यास निरर्थक है।
आचार्य…
आचार्य प्रशांत: अधर्म को छोड़कर, जो इन दोनों का कारण…
आचार्य प्रशांत: पहली पंक्ति कह रही है कि…
~ अष्टावक्र गीता
आचार्य प्रशांत: जब उस योगी ने जान ही लिया है कि वही समस्त भूतों में निवास करता है और समस्त भूत उसमें हैं, तब ये बड़े आश्चर्य की बात है कि अभी भी उसमें ममत्व बचा रहे। जिस मुनि…
अनुवाद: जीवन्मुक्त का चित्त ध्यान से विरक्त होने के लिए और व्यवहार करने के लिए प्रवृत्त नहीं होता है। किन्तु निमित्त के शून्य होने पर भी वह ध्यान से विरत भी होता है और व्यवहार भी…
प्रश्नकर्ता: किस स्वतंत्रता की बात…
~ अष्टावक्र गीता (…
आचार्य प्रशांत: इच्छा को शांत करना कोई…
आप असंग, अक्रिय, स्वयं-प्रकाशवान तथा सर्वथा-दोषमुक्त हैं। आपका ध्यान द्वारा मस्तिस्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है ॥15॥
~ अष्टावक्र गीता
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अष्टावक्र इस श्लोक में ऐसा क्यों कह रहे हैं कि ध्यान की हर विधि…
श्रोता: इसमें लिखा हुआ है की मन को नियंत्रित करो |
आचार्य जी: इसमें लिखा है की तुम्हारी जागृति हुई नहीं है और तुमने तरीके अपना रखे…
To whom does the conflict of duties performed and not performed…
कृता-कृते, कृता-कृते, कृत-अकृते, performed-not performed, done-not done.
To whom does the conflict of duties performed and not performed, and of the pairs…
वक्ता: “मूर्ख उस आत्मा को सुन…
अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए क्या स्वप्न है, और क्या सुषुप्ति तथा क्या जागरण है और क्या तुरीय अवस्था है अथवा क्या भय ही है?…
(अष्टावक्र गीता, १८.७४)
आचार्य…
(आत्मा के सम्बन्ध में जो लोग प्रयास में लग रहे हैं, वे अपने शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, निष्प्रपंच और निरामय
ब्रह्म स्वरुप को नहीं जानते)
आचार्य प्रशांत: तुम ये सब हो, पर तुम्हें…
(जिसने अपने से भिन्न परब्रह्म को देखा हो, वह चिन्तन किया करे कि वह है
ब्रह्म पर जिसे कुछ दूसरा दिखाई नहीं देता, वह निश्चिन्त क्या विचार करे)
आचार्य प्रशांत:…
एह अगन बिरहों दी जारी, कोई हमरी तपन निवारी।
बिन दर्सन कैसे तरिये, हुण की करिये।।
दोनों ही उदाहरणों में दर्शन शब्द आया है।…
अर्थ: “भाव और अभाव के माध्य स्वभाव का कभी नाश नहीं होता”
आचार्य प्रशांत: जिस सवाल का अष्टावक्र यहाँ पर जवाब दे रहें हैं, वो सवाल है कि, “क्या ‘है’?”। किसको कहा जाता है कि ‘है’?…
(जो धीर पुरुष अनेक विचारों से थककर अपने स्वरूप में विश्राम पा चुका है,
वह न कल्पना करता है, न जानता है, न सुनता है और न देखता ही है)
आचार्य प्रशांत: पहली…
वक्ता: तीन बातें हैं जिन पर अष्टावक्र का जोर…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कृष्ण कहते हैं “सर्वधर्मान्परित्यज्य…
वक्ता: (श्लोक का अर्थ समझाते हुए) कभी शरीर से दुःख है, कभी वाणी से दुःख है, कभी मन से दुःख है। इन सब का त्याग कर के मैं पुरुषार्थ में स्थित…