
Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…

स्त्री चूँकि गर्भ रखती है तो प्रकृति ने ही उसे शरीर के प्रति बड़ा संवेदनशील बना दिया है। वो बार-बार अपने शरीर को देखती रहती है क्योंकि उसको एक बहुत महीन काम करना है, डेलिकेट काम; उस काम में अगर ज़रा भी गड़बड़ हो गई, इंफेक्शन हो सकता है, कुछ…

जब सड़क पर निकलो न तो अपनी कमियाँ पता चलती हैं। जो व्यक्ति घर में ही बैठ गया वो बड़ा दम्भी, घमंडी, अहंकारी हो जाता है क्योंकि उसे अपनी कमियों का पता भी नहीं होता। अकसर गृहिणियों की अकड़ बिलकुल लाजवाब होती है। “मैं ही बेग़म हूँ, मैं ही रानी…

कभी किसी से बड़ी नफ़रत उठे तो मैं एक सूत्र बता देता हूँ – अपनी नफ़रत को और अपने अहंकार को थोड़ी देर के लिए किनारे रख कर उससे 1 घण्टे बात कर लेना, फिर नफ़रत कर नहीं पाओगे और ज़्यादा। इसलिए जिन्हें नफ़रत क़ायम रखनी होती है, पहला काम…

वो कहानी याद है न कि दस जने उतरे हैं पीये हुए, किससे? एक नाव से उतरे हैं, ठीक है? अब वो गिनना चाहते हैं कि कोई एक रास्ते में टपक तो नहीं गया था नदी में। तो वो सब गिनना शुरू करते हैं, तो गिन रहे हैं कि भैया…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने जैसे कहा था कि “जब कोई पैदा होता है, तो वो वृत्तियों और विकारों के साथ पैदा होता है।” तो छोटे बच्चे इतने खुश क्यों मालूम पड़ते हैं?
आचार्य प्रशांत: जिनके पास बच्चे हों, उनसे पूछो ज़रा!
ये सवाल कोई छड़ा (कुँवारा) ही पूछ सकता है,…

आचार्य प्रशांत: एक आदमी था बड़ा भुल्लकड़। कोई एक चीज़ उसके साथ रहती थी, वो थी उसकी विस्मृतिशीलता। भूलता गया, भूलता गया, और एक दिन पाता है कि वो अपनी हँसी भी भूल गया; भूल ही गया कि हँसना कैसे है।
तो गया एक विशेषज्ञ के पास, कि, “हँसना भूल…

प्रश्नकर्ता: इगो (अहंकार) में और सत्य में क्या अंतर है?
आचार्य प्रशांत: जितने अंतर हैं वह सब इगो में ही हैं। अंतर कुछ कर लो, समानताएँ और अंतर यह सब मानसिक परिकल्पनाएँ हैं। आत्मा में ना कोई भेद होता है, ना अभेद होता है। तुम अगर पूछोगे कि, "अहंकार और…

आचार्य प्रशांत: तो सवाल है कि एक फ़िल्म आई थी 'द मास्क' के नाम से। उसमें जो मुख्य चरित्र था उसे एक मास्क मिल जाता है, एक मुखौटा मिल जाता है। उस मुखौटे के मिलने से उसे दुनियाभर की तमाम लड़ाइयों में जीत मिलने लग जाती है, शोहरत…

आचार्य प्रशांत: ईगो (अहंकार) का सांकेतिक, शाब्दिक, आध्यात्मिक सब एक ही अर्थ होता है – ‘मैं’। ‘मैं’ की भावना को अहम्, ईगो कहते हैं।
प्रश्नकर्ता: तो क्या स्वयं को किसी भी पहचान से परिभाषित करना ही अहम् है?

प्रश्नकर्ता: नागार्जुन कहते हैं कि किसी की सत्ता नहीं है। कर्म, कर्ता, और फल, इसकी लोक व्यवहार की दृष्टि से ही सत्ता है, बाकी निरपेक्ष रूप से इनकी कोई सत्ता नहीं। तो फिर धर्म और अध्यात्म का मतलब क्या है?
आचार्य प्रशांत: जिसके लिए अहं की कोई सत्ता नहीं, उसके…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हर चीज के अंत में मुझे अहंकार ही दिखता है, ऐसा क्यों?
आचार्य प्रशांत: अहंकार जो आत्मा बना बैठा है। अहंकार में कोई बुराई नहीं है, पैदा हुए हो उसके साथ। या बुराई है भी तो तुम्हारी व्यक्तिगत बुराई नहीं क्योंकि तुमने चुना नहीं था कि मुझे…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे वृत्तियाँ अपना काम करती हैं कि क्रोध आ गया, डर आ गया। अब जैसे मैं यहाँ से बाहर निकला और मेरी लड़ाई हो जाए तो शरीर को तो डर लगता है उलझने में, लड़ाई करने में, और साथ-ही-साथ यह तादात्म्य बना रहता है कि यह 'मेरा'…

प्रश्नकर्ता: क्या अहंकार ही हमारी समस्याओं का कारण है?
आचार्य प्रशांत: अहंकार अगर समस्याओं का कारण है, तो उन समस्याओं का अनुभोक्ता कौन है? अहंकार के कारण समस्याएँ हैं, किसको?
तो ये कहना ठीक है कि अहंकार के कारण समस्याएँ होती हैं। पर ये कहना और ज़्यादा ठीक है कि

प्रश्नकर्ता: अहंकार क्या है और अहंकार से छुटकारा कैसे मिलेगा?
आचार्य प्रशांत: जैसे कह रहे हो न, "मैं सवाल पूछ रहा हूँ मुझे उत्तर जानना है", तो ये जो लगातार 'मैं' की भावना है इसको अहंकार कहते हैं। अहंकार का अर्थ होता है आइ, मैं। दिन रात जिसकी बात…

आचार्य प्रशांत: पंचवर्ग क्या है -- जैसे माया के ही पाँच रूपों, पाँच वर्गों की बात की जा रही हो। आत्मा के ऊपर उपाधि बन कर -- अज्ञान, अविद्या या माया सत्य को छुपाए रहती है, ढके, आच्छादित किये रहती है। उसी अज्ञान को पाँच अलग-अलग तरीकों से कहा गया…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अध्यात्म उपनिषद् कहता है कि तुम अहंकार को गला दो, देख लो कि तुम ये भी नहीं हो, वो भी नहीं हो। तो जो देखने वाला है, वो भी तो अहंकार ही है? कृपया प्रकाश डालें।
आचार्य प्रशांत: सवाल ये है कि, “उपनिषद् कहता है…

प्रश्नकर्ता: समस्या ये है कि आत्मा भी चाहिए और अहंकार छूटता नहीं।
आचार्य प्रशांत: 'अहंकार' को आत्मा चाहिए समस्या ये है। 'अहंकार' कहता है मुझे चाहिए। उसकी नियत में ख़राबी नहीं है उसे चाहिए पर वो कहता है कि 'मुझे' चाहिए। वो ये नहीं कहता मैं उसको मिल जाऊँ, वो…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी हिंसा की जो बात हो रही थी अभी उसके बारे में एक प्रश्न था कि कभी ऐसी स्थिति बन जाए कि आत्मरक्षा के लिए, या किसी निर्दोष की रक्षा के लिए हिंसा करनी पड़ जाए या हो जाए अचानक से, तो वह हिंसा होगी या नहीं?
आचार्य…

प्रश्नकर्ता: अहंकार कब ख़त्म होता है?
आचार्य प्रशांत: जब उसको अपने ख़त्म होने में कोई रुचि न रह जाए। आपका सवाल बताता है कि अभी उसके ख़त्म होने में रुचि है आपको। किसके ख़त्म होने में रूचि होती है? जिसके होने का एहसास होता है।
अहंकार उस दिन ख़त्म हुआ

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम अपने अहंकार को जीतने क्यों देते हैं? जैसे आपने अभी बताया हम लोगों को कि हमको अपने मन की गंदगी देखना ज़रूरी है, ये अभी हमको पता चल गया कि ये सही चीज़ है, फिर भी क्यों हम भूल जाते हैं? अहंकार क्यों पनपता है, बढ़ता…

प्रश्नकर्ता: परमात्मा और हम, उसके बीच में अहंकार है। उस अहंकार की वजह से हम परमात्मा से मिल नहीं पाते। तो अहंकार मिटाने के लिए क्या करना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: आपने पहले जो बोला, आप उस बारे में पूरी तरह आश्वस्त हैं क्या? – “परमात्मा और हम, और बीच में…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यह जो 'मैं' (अहम्) है, जो शरीर की समाप्ति के साथ ही ख़त्म हो जाता है, वह असल में है क्या?
आचार्य प्रशांत: वो एक वृत्ति है। वो एक भटकी हुई वृत्ति है जिसका अपना कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। वो चिपकना भर जानता है। वो इससे …

प्रश्नकर्ता: क्या सभी के सामने झुक जाने से हमारा अहंकार कटता है?
आचार्य प्रशांत: क्यों झुकोगे सभी के सामने? और सभी के सामने तो तुम झुकते भी नहीं। जब कह रहे हो 'सभी के सामने,’ तो दस, बीस, चालीस, दो-सौ, पाँच-सौ लोगों की बात कर रहे होगे। सभी माने इस…

प्रश्नकर्ता: एक बार एक संत से पूछा गया कि, "कर्ता और अकर्ता भाव में अंतर क्या है?” तो उनका उत्तर आया कि, "कर्ता और अकर्ता कोई है ही नहीं।" और अभी आपने बंधनों की बात कही। बंधन मेरे ही हैं और इन बंधनों से छूटना मुझे ही है। इन दोनों…

प्रश्नकर्ता: एक और प्रश्न था कि माया अपना आखिरी दाँव खेलती है; अहंकार- वो कैसे पता चले?
आचार्य प्रशांत: दाँव कुछ नहीं होता उसका। आखिरी तो तब न जब किसी बिंदु पर आ करके उसको मिट जाना हो। आप सतर्क, सावधान रहिए जब तक देह है तब तक माया है।…

कहता हूँ कहि जात हूँ, कहा जु मान हमार।
गल तुम काटि हो, सो फिर काटि तुम्हार।।
~ संत कबीर

प्रश्नकर्ता: समाज में छवि बनाने की चाह क्यों रहती है?
आचार्य प्रशांत: छवि भी यूँ ही नहीं पकड़ लेते, उसके पीछे भी बड़े भौतिक कारण हैं। जानवरों में तुम नहीं पाओगे कि इतनी ज़्यादा इमेज कॉन्सशियसनेस (छवि सतर्कता) है। छवि को लेकर वो इतने सजग नहीं होते। तुम ये नहीं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ‘मैं’ भाव क्या है? मैं ऐसा महसूस करती हूँ कि शरीर में ‘मैं’ हूँ। ‘मैं’ क्या चीज़ है? जब तक मेरा अस्तित्व है, तब तक मैं ‘मैं’ को महसूस कर रही हूँ। बाद में ये ‘मैं’ कहाँ चला जाता है? क्या होगा इसका?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं…

आचार्य प्रशांत: सही भाषा, एक सही जीवन का ‘सहायक-फल’ है।
श्रोता: सही जीवन बता दीजिये क्या है?
आचार्य जी: ग़लत जीवन क्या है, पहले वो समझते हैं! ग़लत जीवन वो है, जो तुम जीते हो।

प्रश्न: आचार्य जी, बाहरी प्रभावों से कैसे बचा जाए?
आचार्य प्रशांत: (सत्संग शुरू होने के कुछ समय पहले आचार्य जी ने कुछ श्रोताओं को शांत होकर बैठने के लिए कहा। उसी बात का उल्लेख आचार्य जी ने उदाहरण के रूप में लिया।)

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आचार्य प्रशांत: नैन्सी का सवाल है कि, ‘अगर बताया गया कि अहंकार ‘मैं’ है तो इसके साथ बड़ी समस्याएं हैं, वो एक बीमारी के तरह भी…

प्रश्न: आचार्य जी, ‘अपराध बोध’ क्या है?
आचार्य प्रशांत: गहरा अहंकार। मैं, मुझ जैसा, ग़लती कैसे कर बैठा, यह ‘अपराध बोध’ है। इससे फिर निकलता है, पछतावा, ग्लानि, कुंठा। उसके मूल में यही है, मैं गलती कैसे कर बैठा और एक दूसरा मन होता है, जो कहता है, “हम जैसे…

प्रश्न: आचार्य जी, ‘ध्यान’ में, वृत्तियों को भी पकड़ा जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: उससे ज़्यादा सही शब्द ‘ध्यान’ है या ‘ईमानदारी’ है। वृत्ति तो हर समय अपना ज़ोर दिखाती ही रहती है ना? उसके लिए, उसको पकड़ने के लिए, ईमानदारी ज़्यादा चाहिए। तुमने देखा नहीं है, कई बार कोई…

प्रश्न: आचार्य जी, ये घटना मेरे साथ घट चुकी है, वो बता रहा हूँ । एक बार मैं अपने घर, लखनऊ जा रहा था । तो एक माँ और उनके साथ एक बहुत छोटा बच्चा बैठा था । मैं उनके पास ही बैठा था । रास्ते में एक पेड़…

There was a certain ascetic who was one of the great saints of Bestam. He had his own followers and admirers, and at the same time, he was never absent from the circle of Bayazid al-Bistami (or Abu Yazid al-Bistami). He listened to all his discourses and sat with his

बहुता कहीऐ बहुता होइ। असंख कहहि सिरि भारु होइ॥
~गुरु नानक
आचार्य प्रशांत: जितना कहोगे उतना कम पड़ेगा। सत्य के विषय में कहने की तो इच्छा खूब होगी तुम्हारी पर जितना कहोगे उतना कम पड़ेगा। ये भी कहोगे कि वो अनंत है, असंख्य है, असंख्यातीत है, ये कहना भी कम

And Jesus said to him, “Foxes have holes, and birds of the air have nests, but the Son of Man has nowhere to lay his head.”
Luke (9:58)
यीशु ने उस से कहा, “लोमडिय़ों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं, पर मनुष्य के पुत्र को सिर

आचार्य प्रशांत: कुछ भी संयोगवश नहीं है। पाँच उँगलियाँ भी हैं तुम्हारी, तो पाँच ही होनी थी, छह नहीं हो सकती। पूरी जो शरीर की विकास प्रक्रिया रही है, जिसमें अस्तित्व के एक एक अणु का योगदान है, उसने ये तय किया है कि पाँच उँगलियाँ हों, और इतना कद…

प्रश्न: आचार्य जी, अपने आप को इस दिशा में ले जाना; आपने तो कहा इस चीज़ का अनुशरण करो, लेकिन मैं ये समझता हूँ, ये आसान काम नहीं है।
श्रोता: कोशिश करो।
प्रश्नकर्ता: नहीं, कोशिश अलग चीज़ है।

प्रश्न: यहाँ तक तो ठीक है कि मैं जानूँ कि दुनिया कैसी है? मेरे भाई कैसे हैं? मेरा दोस्त कैसा है? मेरी संगति कैसी है? समाज कैसा है? यहाँ तक तो मेरा मन अनुमति देता है पर जब बात आती है अपने को भीतर से जानने की तब बहुत डर…

आचार्य प्रशांत: क्या नाम है?
श्रोता: सर, राकेश।
वक्ता: राकेश, ये सवाल पूछना ज़रूरी था क्या? तुम्हारे लिए था ज़रूरी? तुमनेंं, तुम्हारे बगल में जो बैठा है, उससे अनुमति ली क्या सवाल पूछने के लिए? जो उधर बैठा है, उससे अनुमति ली? मेरे हाथ में माइक

श्रोता१: जो भी माइंड (मन) में थॉट्स (विचार) घूमते रहते हैं, वो तो हमेशा होते ही हैं।
वक्ता: हाँ, हाँ।
श्रोत१: लेकिन उनके बारे में सोचने लगता हूँ तो फ्रस्ट्रेशन अपने आप बढ़ती रहती है।

श्रोता: आचार्य जी, अभी आपने कहा कि अगर प्रेम चाहिए तो परमात्मा हो जाओ। पर इतिहास देखा जाए, तो जितने भी संत हुए हैं, उनके चाहने वाले कम और विरोधी ज़्यादा रहे हैं। ऐसा क्यों?
आचार्य प्रशांत: उनकी हिस्ट्री छोड़ो, तुम्हें नहीं पता की जो विरोधी हो रहे हैं, वो…

प्रश्नकर्ता: सर, जो हम बचपन से करते आ रहे हैं, उससे कैसे हटें?
आचार्य प्रशांत: इस कमरे में तुम्हारे बचपन से अँधेरा है। यहाँ पर एक बल्ब जला दूँ, तो रौशनी होने में क्या दो-चार साल लगेंगे? कितना समय लगेगा?

प्रश्न: मन की हमेशा से एक आदत होती है कि एक तरह के तौर तरीके से चलना। तो ये बीमारी है या स्वभाव है मन का?
वक्ता: आदत है, स्वभाव नहीं। मन की प्रकृति है और प्रकृति में आप जानते ही हैं कि तमों गुण भी होता है। तीन गुण…

प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल ये है कि हमने पहले कई सत्रों में चर्चा की है कि इच्छा से परेशानी नहीं होती, आसक्ति से परेशानी होती है। हम इच्छा कर सकते हैं लेकिन हम दुखी इसीलिए हो जाते हैं क्योंकि हम उससे आसक्त हो जाते हैं। लेकिन यहाँ इच्छा से मुक्त होने…

वक्ता: मन का ये बड़ा ही शातिर खेल होता है कि जिस भी चीज़ से उसे डर लगता है, वो उसे इमप्रैक्टिकल लेबल कर देता है और फिर कहता है कि, ‘’ये कार्य किया नहीं जा सकता क्योंकि ये इमप्रैक्टिकल है’’ कार्य इमप्रैक्टिकल है या तुमने उसे ऐसा लेबल दे…

श्रोता:सर, हम कैसे अपने निजता को पाएं? जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, तब हम उसे खो देते हैं।
वक्ता:तुम्हारा नाम क्या है?
श्रोता:अभिषेक।

वक्ता: आनंद साहिब से है कि:
उसने शरीर के वाद्य यंत्र में सांस फूंकी और नौ द्वार खोल दिए लेकिन दसवें को छुपा के रखा।
प्रश्न है कि दसवां द्वार कौन सा है? कौन सा हो सकता है दसवां द्वार?
श्रोता: वही जानना चाहता हूँ।
आचार्य जी: ग़लत…
कौन चाहता है बुरा बनना? कोई नहीं चाहता है…
वक्ता: नहीं बढ़ेगा क्योंकि जिसको तुम फ्रस्ट्रेशन कह रहे हो ना, वो भी सिर्फ़ एक …
मन का है। नौ द्वार हैं शरीर के जो बाहर…